सेवा भाव के ह्रास से खंड-खंड होती सामाजिक समरसता

सेवा भाव के ह्रास से खंड-खंड होती सामाजिक समरसता

सुभाष चन्द्र जोशी

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साहित्य हो या कला किसी भी श्रेणी का सृजन समाज में व्याप्त प्रवृत्तियों का ही प्रतिबिंब होता है। इस कसौटी पर आकलन करें तो आज पूर्ण ब्राह्मण समाज एक ही दिशा में चिंतन रत है जिसका अभिप्रेत समाज में व्याप्त विभाजनकारी प्रवृत्तियों से मुक्ति एवं समरसता की स्थापना है। ‘युवा औदीच्य’ के जून 2026 अंक में प्रकाशित चारों लेखों में लेखकों के विचार प्रवाह इसी तथ्य की और इंगित करते है।

सर्व प्रथम इस अंक के संपादकीय पर चर्चा करें। ‘संपादकीय’ जो पत्र पत्रिका की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें संपादक द्वारा सामयिक विषयों एवं समाज में व्याप्त प्रवृत्तियों का सतर्क विश्लेषण कर अपने सार्थक मार्गदर्शन द्वारा पाठक वर्ग में जाग्रति लाने का प्रयास रहता है। इस संदर्भ में प्रज्ञा वान संपादक श्री उद्धव जी द्वारा ‘वरिष्ठता क्यों मौन है’ लेख में सामाजिक समरसता में आई गिरावट पर अपने विचार रखते हुए ब्राह्मण समाज में समरसता के गिरते स्तर पर चिन्ता व्यक्त की है। भारतीय समाज की पहचान अनेकता में एकता थी परंतु कालचक्र के सतत प्रवाह में राष्ट्रीय नेतृत्व की दुर्बलता से जन्मी दिशाहीनता ने एकता में अनेकता को हमारी पहचान बना दिया। औदीच्य समाज भी इस राष्ट्रव्यापी सत्य से अछूता नहीं। ऊपरी तौर पर संगठित दिख रहा समाज अंदरूनी तौर पर कितना विभाजित है यह महासभा चुनाव के पूर्व एवं परिणामोपरांत जारी अहंकारजन्य अवांछित संघर्ष ने उजागर कर दिया। गीता के अनुसार अहंकार रजोगुण से उत्पन्न विकार है। यह भौतिक महत्वाकांक्षाओं का कारक है सेवा का नहीं। यह तथ्य है कि सेवा भाव और अहंकार प्राय: साथ साथ नहीं रहते। यह भी तथ्य है कि सामाजिक पदों पर सेवा भाव ही समाज की अविभाज्यता का आधार है। समाज के वर्तमान परिवर्तित स्वरूप में समरसता की कल्पना साहित्य का विलोमोक्ति अलंकार होगा। इसे अनुलोम स्वरूप प्रदान करने का समीचीन आह्वान संपादक महोदय ने समाज के सम्मानित वरिष्ठ जनों से किया है इस पर सुधी जनों द्वारा संज्ञान अपेक्षित है।

वरिष्ठ शिक्षाविद् श्री मनोहर भंडारी द्वारा लिखित दूसरे लेख ‘अपराजेय सनातन; सादगी संयम और सर्व कल्याण की राह’ में लेखक सनातन धर्म के शाश्वत होने की बुनियाद उसके शांतिप्रिय और सर्व कल्याणकारी स्वरूप को मानते है परंतु इस पर विघटनकारी शक्तियों द्वारा किए जा रहे सतत प्रहारों से आहत भी है। लेखक द्वारा उद्धृत ‘सनातनस्य धर्म: इति सनातन धर्म:’ अर्थात आदि और अंत से रहित शाश्वत धर्म ही सनातन है। निश्चय ही इस तथ्य से उक्त एजेंडाधारी ताकते अनभिज्ञ नहीं फिर भी इनके बीच चल रही सनातन धर्म के विरूद्ध विष वमन की स्पर्धा का उद्देश्य सनातन धर्म को समाप्त करना संभवतः नहीं है क्योंकि यह जानते है कि यह इनके सामर्थ्य की बात नहीं। इनका छिपा उद्देश्य उस सामाजिक समरसता को भंग करना है जो केवल ब्राह्मण समाज ही नहीं संपूर्ण हिंदू समाज की ताकत है। आजादी के बाद से ही जारी यह प्रयास आज सफलता के समीप है। संपादकीय में जिस ब्राह्मण समाज की समरसता के क्षरण पर चिन्ता व्यक्त की गई है उसका यह व्यापक रूप हैं। इसके दायरे में केवल ब्राह्मण समाज ही नहीं संपूर्ण हिंदू समाज है। सत्य कर्म, कर्तव्य, नैतिकता, सदाचार, सर्व कल्याण, सहिष्णुता आदि सनातन के नियमों को लेखक ने सनातन जीवन पद्धति कहकर परिभाषित किया है, इनके स्रोत वही ग्रंथ है जिनकी रचना प्राचीन युगों में ब्राह्मणों द्वारा की गई थी। अपने ही पूर्वजों द्वारा निर्दिष्ट यह जीवन पद्धति ब्राह्मण समाज अपने आचरण में उतार ले तो औदीच्य महा सभा में चल रही गतिविधियों को लेकर संपादकीय में व्यक्त की गई चिन्ता का समूल अंत होकर समरसता अपने मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित हो सकती है। सनातन धर्म में समय के साथ प्रवेश पा गई कुछ बुराइयों को लेकर सनातन की आलोचना, केवल आवरण है। मूल उद्देश्य हिंदू समाज का विभाजन है। औदीच्य समाज विराट हिंदू समाज की ही एक कड़ी है। इसमें व्याप्त विभाजक प्रवृत्तियां हिंदू समाज की प्रत्येक कड़ी तक प्रसृत होने से संपूर्ण हिंदू समाज विभाजन के कगार पर है। यही विघटनकारी ताकतों का एजेंडा था। आदिकाल से समाज का मार्गदर्शक होने के नाते हिंदुत्व के उत्थान हेतु ब्राह्मण समाज को पहले स्वयं को इन बुराइयों से मुक्त करना होगा।

श्री बी एल शर्मा द्वारा लिखित तीसरा लेख ‘गुट निरपेक्षता से सामाजिक एकजुटता को मजबूती दें’ में सामाजिक विकास के लिये गठित औदीच्य महा सभा की नई कार्यकारिणी को कार्यभार के हस्तांतरण में आ रहे गतिरोध को लेकर लेखक की उद्विग्नता स्वाभाविक है। समाज में जिस समरसता की अपेक्षा संपादकीय में की गई है वह औदीच्य महा सभा में चल रहे संघर्ष, जो अब कानून के द्वार पर है, के कारण खंड-खंड होने को है। औदीच्य महा सभा में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर समाज में चल रही चर्चाओं पर बिना पुख्ता प्रमाणों के प्रतिक्रिया उचित नहीं परंतु लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए प्रतिनिधियों को कार्यभार के हस्तांतरण में आनाकानी ऐसी अनियमितता है जो कतई स्वीकार्य नहीं। गुट बाजी छोड़ बातचीत द्वारा सर्वसम्मत हल खोजने हेतु मार्गदर्शक मंडल से लेखक की अपील और संपादकीय में वरिष्ठ जनों से मध्यस्थता की अपील समानधर्मी होकर समरसता स्थापित करने का बेहतर विकल्प है। दोनों पक्षों से जुड़े वरिष्ठ जन, एक समिति गठित कर दोनों पक्षों के लिये सम्मान जनक हल खोजने का प्रयास करें तो तकरार का अंत हो सकता है।

चौथे लेख में भावनाओं पर बुद्धि को वरियता देने संबंधी अपील सरकार और समाज दोनों से है। सरकार से सवर्ण विरोधी नीतियां त्याग समरसता की स्थापना हेतु समानता की नीति पर चलने की अपेक्षा की है। लेखक का कथन कि ‘चुने हुए प्रतिनिधियों की प्रवृत्ति भीड़ से भिन्न न्याय दृष्टि से परिपूर्ण एवं बुद्धि द्वारा नियंत्रित होना चाहिये’ औदीच्य महा सभा में व्याप्त कटुता के दौर में प्रासंगिक है। महासभा में जो आज पराजित हुए कल वे भी चुने हुए प्रतिनिधि थे अतएव उन्हें वर्तमान में चुने गए प्रतिनिधियों से संघर्ष के बजाय सामंजस्य बना वरिष्ठ जनों की गठित समिति के निर्देशन में मतभेदों को सुलझाना एवं ब्राह्मणोचित बुद्धि के प्रयोग द्वारा समरसता की स्थापना कर समाज की चैतन्यता का परिचय देना चाहिये ।