भावनाओं पर बुद्धि को वरीयता दे, सरकार और समाज

भावनाओं पर बुद्धि को वरीयता दे, सरकार और समाज

सुभाष चन्द्र जोशी

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संख्या बल पर आधारित लोकतांत्रिक शासन पद्धति का यह दुर्बल पक्ष है कि इसमें, सफल राज्य संचालन के अनिवार्य सिद्धांत ‘समानता’ की बली देकर सत्ता हथियाने के सरल मार्ग, संगठित समूहों के तुष्टिकरण, का सहारा लिया जाता है। नीतिगत मामलों में तुष्टीकरण नीति, देश समाज के हित में नहीं होती। सड़क पर एकत्र संख्या बल, अनियंत्रित भीड़ हैं। जिसमें बुद्धि पर भावनाओं को वरियता होती है। अनियंत्रित भीड़ का अंग बनने पर शिक्षित लोग भी प्रायः बुद्धि के प्रयोग से परहेज करते है। सरकार द्वारा ऐसी भीड़ का तुष्टीकरण भीड़ के इस्तेमाल कर्ता को लाभान्वित करता है भीड़ में आए सामान्य लोगों को नहीं। भीड़ की प्रकृति में स्थायित्व के अभाव के कारण इसका आक्रोश अस्थायी होता है परंतु इसका दोहन करने वाले तत्व राजनीति में स्थायी रूप से पैर जमा लेते है। विगत वर्षों जय प्रकाश नारायण और अन्ना हज़ारे के आंदोलन में एकत्र भीड़ के भावनात्मक ज्वार से उदित, लालू प्रसाद यादव एवं अरविंद केजरीवाल इसका उदाहरण है। इसके विपरीत संसद में संख्या बल वास्तव में उत्तरदायी शासक वर्ग है जिसका चरित्र भीड़ से भिन्न होने के कारण यहां भावनाओं पर बुद्धि के नियंत्रण एवं न्याय दृष्टि की अनिवार्यता है। अतएव शासक वर्ग, नीतिगत निर्णय, तुष्टीकरण के बजाय गीता में उपदेशित समभाव अथवा समत्व को अपनी नीति का अंग बनाएं। सब का साथ सब का विकास एवं सब का विश्वास जैसी नीति समत्व बुद्धि का ही विस्तार है। इसका विलोम तुष्टीकरण है।

पिछले दिनों सरकार द्वारा समत्व बुद्धि की पुकार अनसुनी कर, स्वार्थी जाती वादी नेताओं के दबाव में कुछ जाति समूहों के तुष्टीकरण द्वारा अपने दलीय हित साधने के लिये एट्रोसिटी एक्ट एवं यूजीसी कानून लाया गया। इससे नेताओं की राजनीतिक जमीन शायद वोटों की फसल उगल सके परंतु आम जनता को इन कानूनों से लाभ कम हानि अधिक हुई। यद्यपि संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार के चलते सवर्ण या दलित जैसे शब्द आज अर्थहीन है परंतु भारतीय राजनीति में जातिवाद और तुष्टीकरण जैसे सत्ता प्राप्ति के तुरुप कार्ड चल, दलित हितैषी दिखने के प्रयास में सरकार दलित नेताओं के तुष्टीकरण हेतु, ऐसे सवर्ण विरोधी अन्यायपूर्ण कानून लाई। यद्यपि दलित नेताओं की इस कामयाबी से सामान्य दलितों को कुछ लाभ नहीं हुआ उलटे कुछ शरारती तत्वों द्वारा इन कानूनों के दुरुपयोग की घटनाओं ने सामाजिक अलगाव में वृद्धि की। नतीजतन विभिन्न वर्गों में दूरियां बढ़ने एवं हिंदू समाज की सामाजिक संरचना छिन्न भिन्न होने से देश विरोधी तत्वों को बल मिलने का खतरा बढ़ा एवं समरसता हेतु आरएसएस का दशकों का तप निष्फल हुआ।

अतएव ऐसे स्वार्थ प्रेरित निर्णयों का प्रबल विरोध सर्वथा उचित है परंतु प्रभावित समाज द्वारा इसके विरोध का विस्तार राष्ट्र वादी सरकार को अस्थिर करने या निकट भविष्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा अपदस्थ करने तक करना, बुद्धि के प्रयोग से रहित केवल सवर्ण समाज में व्याप्त उग्र भावनाओं का पोषण मात्र होगा। जिससे समाज कमजोर एवं राष्ट्र विरोधी तत्व बलवान होंगे। दलित नेताओं की कुंठित भावनाओं के पोषण हेतु पक्षपातपूर्ण कानून लाकर बुद्धि को तिलांजली देने की जो भूल सरकार ने की, पीड़ित समाज द्वारा संभावित उक्त प्रतिक्रिया भी वैसी ही भूल होगी। इस सरकार का पतन उक्त कानूनों से लाभ के आकांक्षी दलित एवं इन कानूनों के माध्यम से संभावित प्रताड़ना से आशंकित सवर्ण समाज, दोनों के हित में नहीं है।

संसद में सवर्ण समाज के नुमाइंदों की इन कानूनों पर खामोशी आश्चर्यजनक नहीं, क्योंकि वह सरकार के अंग है। और यह कटु वास्तविकता हे कि दलित, सवर्ण दोनों वर्ग के नेताओं के लिये समाज, अपने राजनीतिक उत्थान की सीढ़ी मात्र है। सामान्य जनता चाहे तथाकथित सवर्ण हो या तथाकथित दलित, इस्तेमाल की वस्तु है और ऐसे कानूनों के विपरीत परिणामों की पीड़ा भुगतने को अभिशप्त भी। अतएव सवर्ण समाज के लिये आवश्यक है कि वह इन एकतरफा कानूनों का तीव्र विरोध कर कानून वापस लेने हेतु सरकार को विवश करें परंतु इस प्रक्रिया में भावनाओं पर नियंत्रण रख बुद्धि का प्रयोग करें और चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने के देश विरोधी षड्यंत्र का उपकरण बनने की भूल न करें।