डॉ. प्रीति पाण्डे
व्याख्याता प्राचीन भारतीय इतिहास,
संस्कृति एवं पुरातत्त्व अध्ययनशाला सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय,
उज्जैन (म.प्र.)
विश्व के प्राचीनतम धर्म के आदि देव शिव जो उस संकल्पना से मानव जीवन में उद्भूत होते हैं जिसमें वे मानव को प्रकृति के साथ तादात्म्य करना सिखाते हैं। जिसमें वे मनुष्य के ही नहीं अपितु समस्त चराचर ब्रह्मांड के संरक्षक हैं। इसमें यह विश्वास पनपता है कि प्रकृति समस्त जीव-जन्तुओं के लिये समान है इसका दोहन नहीं करना है वरन् उसके साथ संतुलन करके विकसित होना है। यही कारण है कि आदि देव शिव “पाशुपत” अर्थात् समस्त जीवों के अधिपति के रूप में सर्वप्रथम पहचाने जाते हैं।
भारत में धर्म पूजा पद्धति नहीं वरन् आचरण पद्धति के रूप में विकसित हुआ अर्थात् वे नैतिक तत्व जो में अंगीकार करना ही धर्म का मूल है। शिव इस अवधारणा के अधिष्ठाता देव बनकर सामने आते हैं। सृष्टि से संतुलन आदर्श आचार विचार से सर्वोपरि शिव इस आध्यात्मिक विचारधारा का भी प्रबोधन करते हैं जिसमें यह स्पष्ट होता है कि मानव को जीवनचक्र में चलना है और उत्पत्ति एवं मोक्ष के चक्र में चलते हुये पृथ्वी का संतुलन बनाये रखना है। शैव दर्शन के सार अथवा प्रतीक स्वरूप शिव तांडव से सम्बन्धित समस्त प्राचीन नवीन तथ्यों का संकलन करके सम्यक् विश्लेषण करना इस पत्र का मुख्य अमीष्ट है।
तांडव शब्द ‘तण्डु धातु से बना है जिसका अर्थ है ऊर्जा या कंपन्न अर्थात् जिसे नृत्य में ऊर्जा का प्रवाह अत्यधिक हो वह तांडव है। तांडव मूलतः शिव द्वारा प्रस्तुत एक विशिष्ट अलौकिक नृत्य है जिसमें शिव आनंद मिश्रित रौद्र भाव में निर्माण, पालन एवं संहार के चक्र को दर्शाते है।
कालांतर में अपने नन्दी ‘तण्डु के द्वारा वह भरतमुनि को दिखाया गया इस कारण से भी इसे तांडव कहा गया ऐसी भी मान्यताएँ है। शिव पुराण के अनुसार शिव तांडव ब्रह्माण्डीय चक्र के प्रारम्भ एवं समाप्ति पर ही करते हैं। अतः यह तांडव सृष्टि के प्रारम्भएवं अंत का सूचक है। शिव के तांडव की उत्पत्ति के संबंध में उनकी पत्नी सती द्वारा अपने पिता हिमालय के घर में पति का सम्मान न होने पर देह अग्नि में भस्म कर दी जिस कारण दुःख में विकराल होकर शिव ने सती के शरीर को हाथ में लेकर नृत्य किया जो तांडव कहलाया। शोक, करूणा, क्रोध के समन्वित भाव इस नृत्य में मिलते हैं जो आसक्ति से विरक्ति की ओर मनुष्य के विस्थापन को दर्शाता है वहीं शिव के शक्ति प्रति सम्मान एवं प्रेम का भी द्योतक है।
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में 7 प्रकार के तांडव नृत्य बताये है- 1. आनंद तांडव, 2. संहार तांडव, 3. शिव तांडव, 4. कल्याण तांडव, 5. संध्या तांडव, 6. त्रिपुर तांडव, 7. गौरी तांडव । इन सभी में शिव तांडव को शुद्ध तांडव भी कहा जाता है। इस प्रकार तांडव को भारतीय साहित्यिक नृत्य का प्रारम्भ भी माना जाता है वहीं भरतनाट्यम जैसी महत्त्वपूर्ण नृत्य शैलियों तांडव से अत्यन्त प्रभावित है।
यदि हम तांडव के आध्यात्मिक पक्ष को देखे तो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होते है। तांडव शिव के प्रतीकों में सर्वप्रथम डमरू ब्रह्मनाद का द्योतक है। जो ध्वनि तरंगों के द्वारा निर्माण का प्रतीक है। वहीं शिव की अभय मुद्रा संरक्षण का संकेत देती है। हाथों में अग्नि संहार का प्रतीक है जो प्रकृति की शाशवतत्त एवं संतुलन के लिये अनिवार्य है। असुसर अपसमार पर एक पैर से खड़े होने पर शिव संकेत देते है कि अंदरूनी असुरों जैसे अविद्या को मार कर आप शान्त एवं स्थिर होते हैं। वही हवा में उठा हुआ पैर मोक्ष एवं मुक्ति का द्योतक है अर्थात् जन्त एवं मृत्यु का प्रतीक है।
शिव तांडव से मानव जीवन के लिये तीन संकेत मिलते हैं –
1. जीवन में संतुलन सर्वाधिक आवश्यक है।
2. परिवर्तन सृष्टि का नियम है यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है अतः परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए।
3. समस्त जीवों के मध्य के परस्पर अन्र्तसम्बन्ध को समझना चाहिए अर्थात् प्रकृति की एक दूसरे के प्रति परस्पर निर्भरता को स्वीकार करना चाहिए। यहाँ कोई एक श्रेष्ठ नहीं है सभी श्रेष्ठ हैं।
तांडव नृत्य के साहित्यिक पुरातात्त्विक स्रोतों की ओर ध्यान दे तो हम पाते है कि सर्वप्रथम तांडव का उल्लेख तैत्तरीय उपनिषद् में पाते हैं। इसके अतिरिक्त रामायण, महाभारत, पुराणों में भी शिव तांडव का उल्लेख मिलता है।
इसी प्रकार प्राचीन पुरातात्त्विक अवशेषों में हम तांडव को पूर्व मध्यकाल को ऐलीफेण्टा की गुफाओं में सर्वप्रथम पाते हैं। चिदंबरम मंदिर (तमिलनाडु) में शिव को नटराज के रूप में उत्कीर्णित किया गया है। इसमें नटराज की 108 नृत्य मुद्राओं का वर्णन है। गुप्त एवं चोलकाल के कई अभिलेखों में तांडव को ब्रह्माण्ड के संतुलन का प्रतीक बताया है। चोलकालीन कांस्य की नटराज प्रतिमा के लक्षण भी विचित्र है। नटराज का शाब्दिक अर्थ है ‘नृत्य के राजा। ये तांडव के आनन्द स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रतिमा में तांडव की एक मुद्रा में शिव अग्नि के वृत के अन्तर्गत तांडव मुद्रा में में खड़े है। चोल साम्राज्य की यह कांस्य मुद्रा न केवल उनकी उत्कृष्ट प्रतिमाशास्त्रीय लक्षण का प्रतीक है वरन् यह उनकी संस्कृति की प्रमुख पहचान भी है।
नटराज तांडव का भौतिक प्रतिनिधित्व करता है यही कारण है कि संपूर्ण विश्व तांडव नृत्य का अध्ययन करके उसे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा एवं चक्र से जोड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि डमरू की ध्वनि से उत्पन्न ब्रह्मनाद एवं शिव का ऊर्जामान नृत्य जिसमें विभिन्न मुद्रायें ऊर्जा के निरंतर प्रवाह को दर्शाती है। ऊर्जा का यह निरंतर प्रवाह ब्रह्माण्ड में ऊर्जा के बहव को बनाये रखता है। इसी कारण सृष्टि के प्रारम्भ एवं अंत में जब शिव इस नृत्य को करते हैं तो ऊर्जा का सृष्टि में प्रवाह होता है। अलौकिक तांडव नृत्य एवं ब्रह्माण्डीय ऊर्जा में इस सम्बन्ध को समझकर स्विटजरलैण्ड में जेनेवा में CERN अर्थात् European Center of Nuclear Research में एक विशाल नटराज की प्रतिमा लगाई गई है। यह प्रतिमा भारत में CERN के मध्य एक समझौते के बाद उनके आग्रह पर 2004 में 2 मीटर तस्वी प्रतिमा दी गई थी। यहाँ के वैज्ञानिकों ने इस नृत्य की तुलना अणुओं की गति से की है। वहाँ के भौतिक शास्त्री फ्रित्ज ने अपनी पुस्तक “The Tao of Physics” में शिव तांडव को सभी अस्तित्व से जोड़ा है। “द शिवा प्रोजेक्ट” ने कलाकारों से तांडव करवाकर उत्पन्न होने वाले कंपन से उसी कंपन के अणु एवं परमाणुओं को नष्ट करने का परीक्षण कर रहे हैं।
शिव के तांडव पर रावण ने शिव तांडव स्रोतम की भी रचना की है। कथा का प्रसंग इस प्रकार है कि जब रावण ने कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास किया तो शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत दबा दिया जिससे उत्पन्न पीडा के कारण शिव को प्रसन्न करने हेतु रावण ने तांडव स्रोतम की रचना की। 17 श्लोकों में रचित यह स्रोत वीर रस एवं ओजस्वी श्लोक से संपन्न है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि आदि देव शिव का कोई भी कार्य एवं कथानक साधारण नहीं है। इसी भांति उनका तांडव नृत्य भी अद्भुत एवं अलौकिक है। साधारणतः सृष्टि के संहारक माने जाने वाले शिव अपने तांडव में मुद्राओं के द्वारा उत्पत्ति अभय एवं संहार का संदेश देती है। नृत्य से उत्पन्न ऊर्जा उसके ऊर्जा के नियमों को स्पष्ट करती है जिससे विश्वभर के भौतिकशास्त्री इस ओर आकृष्ट होते हैं।